सूरत बदलनी चाहिए..
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए..
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.
आज यह दीवार,पर्दों की तरह हिलनें लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए.
हर सडक पर,हर गली में,हर नगर,हर गांव में
हाथ लहराते हुए लाश चलनी चाहिए.
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में ही सही,
हो कहीं भी आग,लेकिन आग जलनी चाहिए.
महान कवि दुष्यंत की ये पंक्तियां देश की आज की परिस्थितियों पर खरी उतरती दिखाई दे रही हैं.. हमारा देश भारत 15 अगस्त 1947 को आज़ादी पाने के बाद बहुत से बदलावों का ग्वाह रहा है..हम बड़े ही खुशकिस्मत हैं कि हमने आज़ाद भारत में अपनी आंखे खोली..लेकिन हमारे पूर्वजों के साथ ऐसा नहीं था...उन्होंने अंग्रेजों के गुलाम भारत में जन्म लिया..कुछ गुलाम भारत में ही स्वर्ग सिधार गए..लेकिन कुछ ने हमारी आज़ादी के लिए अपनी जान को दांव पर लगा दिया. कुछ ने बड़ी ही बहादुरी के साथ अंग्रेजों की गोली को सीने पर खाया.. तो कुछ न हंसते-हंसते फांसी के फंदे को गले लगाया..इन लोगों ने ऐसा सिर्फ इसलिए किया कि आने वाली पीढ़ियां आज़ाद और खुली हवा में सांस ले सकें..उन्हें गुलामी की ज़िल्लत भरी ज़िंदगी से दो चार न होना पड़े...हम सभी को ऐसे महान वीरों पर गर्व है..जो हमारी आजादी के लिए अपने खून का एक-एक कतरा बहा गए..और हमे आज़ादी दिला गए. लेकिन आज़ादी के साठ साल से ज्यादा बीत जाने के बाद भी हम उस आज़ादी का मोल नहीं समझ पाए हैं...
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