Tuesday, March 8, 2011

इच्छा की मृत्यु..



ये महिला पिछले सैंतीस सालों से यू हीं कराह रही है..
चिल्ला रही है.. कष्ट झेल रही है..और यूं ही बिस्तर पर अपनी जिंदगी का हर पल.. हर क्षण जहान्नुम के माफिक बिताने को मजबूर है.. और अब इसकी ज़िंदगी आगे भी यूं ही कटेगी..ये महिला है अरुणा शानबाग.. 

अगर सैंतीस साल पहले की बात करें तो ये है नर्स अरुणा शानबाग..जो केईएम अस्पताल में सेवारत थी.. 

फिर 27 नवंबर 1973 को अस्पताल के ही एक दरिंदे वार्डब्वॉय सोहनलाल वाल्मीकी की हैवानियत का वो शिकार हुई...और तभी से वो कोमा में हैं..और यूं ही इसी हालत में अपना जीवन जीने को मजबूर है..
वैसे अरुणा ने देश में यूथनेशिया यानी इच्छा मृत्यु के बेहद ही संवेदनशील मुद्दे पर बहस छेड़ दी है..दरअसल, अरुणा की एक पत्रकार मित्र पिंकी वीरानी ने अरुणा को इस तरह तिल-तिल कर जीने से मुक्ति दिलाने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट में उसके लिए इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई थी...जिसे देश की आला अदालत ने ठुकरा दिया. गौरतलब है कि करीब 37 साल पहले अरुणा के साथ उनके अस्‍पताल के ही एक कर्मचारी ने उनके गले को कुत्ता बांधने वाली चेन से जकड़कर, उनके साथ अप्राकृतिक दुष्कर्म किया था. उस वक्त अरुणा के दिमाग को ऑक्सीजन मिलना बंद हो गई थी..और तभी से उसके तंत्रिका तंत्र ने काम करना बंद कर दिया था.
वीरानी ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्हें मरने की इजाजत दी जानी चाहिए क्योंकि इज्जत से जीना सभी नागरिकों का मूल अधिकार है और शानबाग के मामले में ऐसा नहीं हो रहा है. उन्होंने अदालत को यह भी कहा कि शानबाग इस स्थिति में नहीं हैं कि अपने बारे में वे कुछ सोचें.
गौरतलब है कि शानबाग के लिए मौत की इजाजत मांगने वाली याचिका दिसंबर  2009 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए मंजूर की थी। हालांकि तब भी तत्कालीन चीफ जस्टिस के. जी. बालकृष्णन, जस्टिस एके गांगुली और बीएस चौहान की बेंच ने कहा था कि भारतीय कानून के तहत हम किसी भी शख्स को मरने की इजाजत नहीं दे सकते।
07मार्च 2011 को सुप्रीम कोर्ट के जज मार्केडेय काटजू और जस्टिस सुधा मिश्रा की खंडपीठ ने अरुणा के लिए इच्छा मृत्यु वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि देश में इस तरह का कोई कानून नहीं है..जो किसी भी शख्स को इस तरह मारने की इजाज़त देता हो..लेकिन कोर्ट ने ये कहा कि कुछ विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथनेशिया की इजाजत दी जा सकती है। अदालत ने पैसिव यूथनेशिया के लिए कुछ दिशानिर्देश भी तय किए...और कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही पहली बार देश में इच्‍छा मृत्‍यु के मामले में एक कानूनी दिशा भी तय हो गई. कोर्ट ने अपना सौ पन्नों का फैसला सुनाते हुए कहा कि कुछ असाध्य रोग से पीडि़त मरीजों के मामले में कानूनी तौर पर लाइफ सपोर्ट सिस्‍टम हटाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि शानबाग के मामले में तथ्य, परिस्थिति, डॉक्टरों की राय आदि को ध्यान में रखकर यह इजाजत नहीं दी जा सकती। बेंच ने कहा कि वर्तमान में इच्छा मृत्यु के संबंध में कोई कानून मौजूद नहीं है, लेकिन कुछ मामलों के लिए कानून बनाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि इस मामले में पैसिव यूथनेशिया की इजाजत इसलिए नहीं दी जा रही है क्योंकि याचिकाकर्ता का शानबाग से खून का रिश्ता नहीं है और उन्हें अधिकार नहीं है कि वे उनके लिए मौत मांगें। अदालत ने यह भी कहा कि जब तक संसद में इस बारे में कोई कानून नहीं बन जातातब तक सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान निर्णय लागू रहेगा.
वैसे अदालत का ये ऐतिहासिक फैसला देश में पहली बार 'पैसिव यूथनेशिया' का रास्‍ता साफ करने में मददगार साबित हो सकता है.
आखिर ये यूथनेशिया है क्या..
यूथनेशिया का शाब्दिक अर्थ होता है इच्छामृत्यु या दयामृत्यु. अर्थात जीवन को खत्म किया जाने का ऐसा तरीका जिससे उस शख्स को दर्द और दिक्कतों से निजात मिल सके. यूथनेशिया में संबंधित शख्स की मर्जी से या उसकी बिना मर्जी से जीवन खत्म किया जा सकता है.
इच्छामृत्यु या दयामृत्यु देने के कई तरीके हैं, जो विदेशों में अपनाए जा रहे हैं। वैसे कई देशों में इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता प्राप्त है.

एक्टिव यूथनेशिया:-इसमें मरीज को जहर आदि का इंजेक्शन लगाकर सीधे तौर पर मार दिया जाता है।

यूथनेशिया बाई ओमीशन:- इसके तहत मरीज को दी जा रही जीवन रक्षक सुविधा हटा ली जाती है और सब कुछ प्रकृति पर छोड़ दिया जाता है।

पैसिव यूथनेशिया -इसमें जीवन रक्षक प्रणाली यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम, दवाएं और इलाज रोकना, भोजन और पानी की आपूर्ति रोकना, हृदय और सांस के लिए मदद रोकने जैसी चीजें शामिल हैं।

फिजिशियन असिस्टेड यूथनेशिया:- इसमें डॉक्टर मरीज को आत्महत्या करने के तरीके मसलन दवाओं के डोज, इंजेक्शन आदि की जानकारी देता है। इसके तहत नींद की गोलियां खाकर, कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस के जरिए आत्महत्या किए जाने की सलाह डॉक्टर देते हैं।  

वॉलंटरी यूथनेशिया: इसमें मरीज की इच्छा के तहत उसे मारा जाता है।

नॉन वॉलंटरी यूथनेशिया: इसमें मरीज न तो मरने की इच्छा जाहिर करता है और न ही इसके लिए सहमति देता है। इसे कुछ नैतिकतावादी हत्या भी मानते हैं।  

इनवॉलंटरी यूथनेशिया:- इसमें मरने वाला मौत से पहले न मरने की इच्छा जाहिर करता है।

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