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| प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह |
नमस्कार प्रधानमंत्री महोदय,
देश में कोई भी सरकार सत्ता में आए,,वो बात करती है मेरे विकास की.. वादा करती है मेरी तरक्की का.. मेरे विकास का..आश्वासन देती है मेरी आने वाली पीढियों की बेहतर शिक्षा और नौकरी का.. नीतियां बनाती हैं मेरे विकास के नाम पर.. मेरे विकास की योजनाओँ के लिए करोड़ों रुपये का बजट जारी करती है.. करोड़ो रुपया खर्च भी करती है उन योजनाओँ पर जिन्हें मेरे समग्र विकास के लिए बनाई गई हैं. हमारे देश को आज़ाद हुए छह दशक से भी ऊपर का समय हो गया है.. इस दौरान कई सरकारें मेरे समुचित विकास के वादे के साथ सत्ता में आईं..और गईं.. योजनाएँ बनीं..नीतियां बनीं..लागू भी हुईं..पंचवर्षीय योजनाएँ बनीं...लागू भी हुईँ..मेरे विकास के लिए अरबों-ख़रबों इस दौरान खर्च भी किए गए..अरबों-खरबों रुपया मेरे विकास के नाम पर खर्च हुआ..जो भी सरकार सत्ता में रही उसने ही मेरी तरक्की और विकास का दंभ भरा..
लेकिन एक बात मेरी आज तक समझ में नहीं आई कि जब अरबों-खरबों रुपये का खर्च सरकारों ने मेरे विकास के लिए किया..तो भी साठ साल बाद मैं आम ही क्यों बना रह गया.. खास क्यों नहीं बन सका..क्या फायदा हुआ मेरे विकास और तरक्की पर अरबों-खरबों रुपया खर्च करने का जब...मुझे आम का आम ही बने रहना है..क्या फायदा मेरे कल्याणार्थ बनाई गई कई योजनाओँ का जब इनके लागू होने के बावजूद मुझे दो जून की रोटी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़े..रोज़गार के पर्याप्त साधन ही उपलब्ध न हों तो क्या फायदा ऐसे विकास का... क्या फायदा ऐसे विकास का..जो मुझे दो वक्त की भूख को शांत करने के लिए दो निवाले भी न दे पाए.. क्या फायदा उस आर्थिक विकास का..जिसकी दर तो ऊंची बनी रहे..लेकिन मुझे पेट की आग को शांत करने के लिए हजार बार सोचना पड़े.. वर्तमान य़ूपीए टू सरकार भारत निर्माण की बात करती है..हाल ही में रेल बजट और आम बजट पेश किया गया. वित्त मंत्री ने शिक्षा,स्वास्थय,कृषि और सेवा क्षेत्रों को थोड़ी बहुत सौगातें दी..लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि मेरे हिस्से क्या आया..फिर वहीं आश्वासन और वादों का पुलिंदा...भई एक बात बताइए आप और वित्त मंत्री महंगाई पर चिंता तो व्यक्त करते हैं..लेकिन इसे रोकने के लिए कोई उपाय नहीं सुझाते हैं. प्रधानमंत्री जी आप तो कहते हैं कि इन दिनों महंगाई के बावजूद मेरी क्रयशक्ति बढ़ गई है..यानी मेरी ज्यादा खाने की हैसियत हो गई है..और मैं बाजार से ज्यादा सामान खरीद रहा हूं..इसलिए महंगाई बढ़ रही है... वैसे हमारे वित्त मंत्री और आप दोनों ही सायबान की चिंता तो कहीं आर्थिक विकास की दर कम न हो जाए इस बात पर है..लेकिन इस बात की ज़रा भी परवाह इन दोनों को नहीं है..कि देश की करीब आधी जनता को दो जून की रोटी बड़ी ही मुश्किल से मयस्सर होती है...जब बात विकास की होती है..तो कहते हैं कि विकास मेरा विकास हो रहा है..अरे भई कहां है वो विकास ज़रा मुझे भी तो पता चले...मेरी थाली तो दिन-ब-दिन सिकुड़ रही है..उसमें से तो धीरे-धीरे आयटम कम होते जा रहे हैं... और फिर कहां हैं आज रोज़गार..वित्त मंत्री ने आम बजट पेश किया..लेकिन मुझ जैसे बेरोज़गारों को रोज़गार कैसे मिले..इसकी चिंता उन्हें नहीं है..उनके बजट भाषण में एक बार भी बेरोजगारी का जिक्र नहीं हुआ.. शायद यह उनके लिए कोई समस्या नहीं है. वैसे इन दिनों भ्रष्टाचार का मुद्दा जोर-शोर से छाया हुआ है.. इसके चलते तिजौरियां भरती हैं राजनेताओं की..आला अफसरों की..हमारे टैक्स के पैसे की गाढ़ी कमाई के अरबों-खरबों डकार जाते हैं ये लोग. और विदेशी बैंकों में जमा कराते हैं..और फिर बात करते हैं काले धन की.. वैसे ये भ्रष्टाचार जो है उसकी जड़ में मुझे लगता है कि शायद मैं ही हूं.. कैसे चलिए बताता हूं...दरअसल सरकारें और उनके अधीन कार्य करने वाले लगभग सभी विभाग मेरे ही विकास,तरक्की और कल्याणार्थ योजनाएँ तैयार करते हैं..फिर उन्हें क्रियान्वित करने के लिए करोड़ों का फंड जारी होता है..संबंधित अधिकारियों-विभागों के पास फंड आता है...अरबों-खरबों देखकर सोचते हैं कि इसमें से थोड़े पैसे डकार जाते हैं..किसे पता चलेगा...बस वहीं से शुरू होता है भ्रष्टाचार.. पहले हजार..फिर लाख और फिर करोड़ों डकारने शुरू करते हैं ये आदर्शवादी लोग..जो बात तो मेरे विकास की करते हैं...लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अपना विकास करते हैं.. बात तो मेरे कल्याण की करते हैं.. लेकिन करते हैं अपना कल्याण... वैसे महंगाई की आंच में मैं किस कदर जल रहा हूं..इसे सिर्फ और सिर्फ मैं ही जानता हूं..रोजमर्रा की हर वस्तु में महंगाई ने आग लगा दी..महंगाई बढ़ी तो सोचि कि मैं दाल-रोटी खाकर गुजारा कर लूंगा.. .लेकिन महंगाई ने मेरी दाल छीन ली..पूरे सौ-सौ रुपये किलो हो गई दाल..जिसे खरीदने की अब मेरी हैसियत नहीं..फिर सोचा प्याज-रोटी खाकर गुजारा कर लूंगा..लेकिन आप तो जानते हैं कि प्याज ने भी मुझे गरीबी के आंसू रूलाकर मुझे मेरी औकात दिखा दी..और मुंह चिढ़ाकर बोली कि मैं तेरे हाथ न आनी..माई नेम इज़ ओनियन..आय एम नॉट फॉर ऑर्डिनरी पीपुल..मुझ जैसे लोगों की उम्मीद तो सरकार से ही बंधी है कि वो महंगाई पर किसी न किसी तरह काबू पाकर मेरे विकास के अपने वादे को निभाएगी..क्या सोच रहे हैं कि मैं कौन हूं..क्या प्रधानमंत्री महोदय अभी तक नहीं पहचाना..चलिए अपना परिचय दे ही देता हूं..कि मैं वही आम आदमी हूं जिसके विकास का वादा कर आप दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं.. सही पहचाना साहब मैं हूं
"आम आदमी"
लेकिन एक बात मेरी आज तक समझ में नहीं आई कि जब अरबों-खरबों रुपये का खर्च सरकारों ने मेरे विकास के लिए किया..तो भी साठ साल बाद मैं आम ही क्यों बना रह गया.. खास क्यों नहीं बन सका..क्या फायदा हुआ मेरे विकास और तरक्की पर अरबों-खरबों रुपया खर्च करने का जब...मुझे आम का आम ही बने रहना है..क्या फायदा मेरे कल्याणार्थ बनाई गई कई योजनाओँ का जब इनके लागू होने के बावजूद मुझे दो जून की रोटी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़े..रोज़गार के पर्याप्त साधन ही उपलब्ध न हों तो क्या फायदा ऐसे विकास का... क्या फायदा ऐसे विकास का..जो मुझे दो वक्त की भूख को शांत करने के लिए दो निवाले भी न दे पाए.. क्या फायदा उस आर्थिक विकास का..जिसकी दर तो ऊंची बनी रहे..लेकिन मुझे पेट की आग को शांत करने के लिए हजार बार सोचना पड़े.. वर्तमान य़ूपीए टू सरकार भारत निर्माण की बात करती है..हाल ही में रेल बजट और आम बजट पेश किया गया. वित्त मंत्री ने शिक्षा,स्वास्थय,कृषि और सेवा क्षेत्रों को थोड़ी बहुत सौगातें दी..लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि मेरे हिस्से क्या आया..फिर वहीं आश्वासन और वादों का पुलिंदा...भई एक बात बताइए आप और वित्त मंत्री महंगाई पर चिंता तो व्यक्त करते हैं..लेकिन इसे रोकने के लिए कोई उपाय नहीं सुझाते हैं. प्रधानमंत्री जी आप तो कहते हैं कि इन दिनों महंगाई के बावजूद मेरी क्रयशक्ति बढ़ गई है..यानी मेरी ज्यादा खाने की हैसियत हो गई है..और मैं बाजार से ज्यादा सामान खरीद रहा हूं..इसलिए महंगाई बढ़ रही है... वैसे हमारे वित्त मंत्री और आप दोनों ही सायबान की चिंता तो कहीं आर्थिक विकास की दर कम न हो जाए इस बात पर है..लेकिन इस बात की ज़रा भी परवाह इन दोनों को नहीं है..कि देश की करीब आधी जनता को दो जून की रोटी बड़ी ही मुश्किल से मयस्सर होती है...जब बात विकास की होती है..तो कहते हैं कि विकास मेरा विकास हो रहा है..अरे भई कहां है वो विकास ज़रा मुझे भी तो पता चले...मेरी थाली तो दिन-ब-दिन सिकुड़ रही है..उसमें से तो धीरे-धीरे आयटम कम होते जा रहे हैं... और फिर कहां हैं आज रोज़गार..वित्त मंत्री ने आम बजट पेश किया..लेकिन मुझ जैसे बेरोज़गारों को रोज़गार कैसे मिले..इसकी चिंता उन्हें नहीं है..उनके बजट भाषण में एक बार भी बेरोजगारी का जिक्र नहीं हुआ.. शायद यह उनके लिए कोई समस्या नहीं है. वैसे इन दिनों भ्रष्टाचार का मुद्दा जोर-शोर से छाया हुआ है.. इसके चलते तिजौरियां भरती हैं राजनेताओं की..आला अफसरों की..हमारे टैक्स के पैसे की गाढ़ी कमाई के अरबों-खरबों डकार जाते हैं ये लोग. और विदेशी बैंकों में जमा कराते हैं..और फिर बात करते हैं काले धन की.. वैसे ये भ्रष्टाचार जो है उसकी जड़ में मुझे लगता है कि शायद मैं ही हूं.. कैसे चलिए बताता हूं...दरअसल सरकारें और उनके अधीन कार्य करने वाले लगभग सभी विभाग मेरे ही विकास,तरक्की और कल्याणार्थ योजनाएँ तैयार करते हैं..फिर उन्हें क्रियान्वित करने के लिए करोड़ों का फंड जारी होता है..संबंधित अधिकारियों-विभागों के पास फंड आता है...अरबों-खरबों देखकर सोचते हैं कि इसमें से थोड़े पैसे डकार जाते हैं..किसे पता चलेगा...बस वहीं से शुरू होता है भ्रष्टाचार.. पहले हजार..फिर लाख और फिर करोड़ों डकारने शुरू करते हैं ये आदर्शवादी लोग..जो बात तो मेरे विकास की करते हैं...लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अपना विकास करते हैं.. बात तो मेरे कल्याण की करते हैं.. लेकिन करते हैं अपना कल्याण... वैसे महंगाई की आंच में मैं किस कदर जल रहा हूं..इसे सिर्फ और सिर्फ मैं ही जानता हूं..रोजमर्रा की हर वस्तु में महंगाई ने आग लगा दी..महंगाई बढ़ी तो सोचि कि मैं दाल-रोटी खाकर गुजारा कर लूंगा.. .लेकिन महंगाई ने मेरी दाल छीन ली..पूरे सौ-सौ रुपये किलो हो गई दाल..जिसे खरीदने की अब मेरी हैसियत नहीं..फिर सोचा प्याज-रोटी खाकर गुजारा कर लूंगा..लेकिन आप तो जानते हैं कि प्याज ने भी मुझे गरीबी के आंसू रूलाकर मुझे मेरी औकात दिखा दी..और मुंह चिढ़ाकर बोली कि मैं तेरे हाथ न आनी..माई नेम इज़ ओनियन..आय एम नॉट फॉर ऑर्डिनरी पीपुल..मुझ जैसे लोगों की उम्मीद तो सरकार से ही बंधी है कि वो महंगाई पर किसी न किसी तरह काबू पाकर मेरे विकास के अपने वादे को निभाएगी..क्या सोच रहे हैं कि मैं कौन हूं..क्या प्रधानमंत्री महोदय अभी तक नहीं पहचाना..चलिए अपना परिचय दे ही देता हूं..कि मैं वही आम आदमी हूं जिसके विकास का वादा कर आप दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं.. सही पहचाना साहब मैं हूं
"आम आदमी"

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