संवेदनहीन समाज..मरती मानवता
कहते हैं इंसान-इंसान के काम आता है..और पड़ोसी-पड़ोसी के काम आता है..पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था कि आप मित्र बदल सकते हैं..पर पड़ोसी नहीं बदल सकते..लिहाज़ा पड़ोसी से आपके संबंध अच्छे होने चाहिए..लेकिन आज शहरी समाज में फ्लैट संस्कृति बड़ी तेजी से पनपी है. अगर तीन फ्लैट आमने-सामने एक ही माले पर हों...तो फ्लैट नंबर एक में रहने वाले को नहीं पता..कि फ्लैट नंबर दो में कौन रह रहा है..यही हाल फ्लैट नं तीन वाले का भी है..उसे भी नहीं मालूम होता कि नंबर एक और दो में कौन रह रहा है...लब्बोलुवाब यही है कि किसी को भी एक दूसरे के बारे में कुछ नहीं मालूम होता. वैसे तेजी से भागती-दौड़ती जिंदगी में लोग अपने में ही इतने मशगुल होते हैं.. कि पता ही नहीं होता कि उनके अगल-बगल में क्या हो रहा है..हर कोई अपने में ही मस्त है..हर कोई अपनी ही फिक्र में जिंदगी के दिन काट रहा है.. जी हां..हमारी इसी मानसिकता के चलते उत्तरप्रदेश के नोएड़ा में एक सनसनीखेज वाकया सामने आया है. .जहां पिछले सात महीने से एक ही फ्लैट के भीतर दो बहने खुद को कैद करके रखती हैं.. लेकिन अगल-बगल वाले उनकी सुध नहीं लेते.
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| मौत से जूझती जिंदगियां |
हालांकि बाद में एक समाजसेवी संस्था की पहल पर पुलिस घर का दरवाज़ा तोड़कर इनकी सुध लेने पहुंचती तो है..लेकिन जब दरवाजा तोड़कर अंदर जाया जाता है..तो घर के अंदर का नज़ारा बेहद ही खौफनाक और दिल दहला देने वाला था..नज़ारा ऐसा था कि मानवता रो पड़े.. कमरे के अंदर से बदबू आ रही थी. एक बहन मरणासन्न हालत में सोफे पर पड़ी थी.. तो दूसरी की हालत भी काफी खराब थी..दरअसल सात महीने पहले इनके पिता जो कि सेना में एक कर्नल थे..कि मृत्यु हो गई थी..जिसके बाद इनके भाई के साथ भी इनका मनमुटाव हो गया..और वो भी इन्हें छोड़कर चला गया.. ये भी बताया जाता है कि दोनों बहनों ने भाई को पढ़ाने के लिए शादी भी नहीं की...भाई के घर छोड़कर चले जाने के बाद दोनों ही एकाकीपन का शिकार हो गईं..और खुद को कमरे में कैद कर लिया..फिलहाल बड़ी बहन की मौत हो चुकी है..और दूसरी मौत और जिंदगी के बीच झूल रही है...ये वाकया हमारे समाज को आइना दिखाने के लिए काफी है..धीरे-धीरे हमारे भीतर से इंसानियत का लोप होता जा रहा है...सभी लोग अपने दो रूम के फ्लैट में मस्त है..किसी को भी समाज और उसके भीतर रहने वालों के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं है..धीरे-धीरे समाज में एक-दूसरे के प्रति संवेदनाएं कम होती जा रही है..या फिर यूं कहें कि संवेदनाएँ मर सी गई हैं..तो शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.. लेकिन क्या ये सही है कि हमारा समाज लोगों के प्रति संवेदनहीन हो जाए.. क्या हमारे भीतर अभी भी कोई नैतिकता नहीं बची हैं.. या वो भी सब पश्चिमी संस्कृति की ही भेंट चढ़ती जा रही है..क्या हम इतने खुदगर्ज हो गए हैं.. कि कोई शख्स हमारी आंखों के सामने परेशानी में हो...और हम अपनी आंखें मूंद कर आगे निकल जाए. हम भारतीय ऐसे तो न थे..फिर क्यों नोएडा का दिलदहलाने वाला वाकया हो गया..एक बार ज़रा ठहरकर इस बारे में सभी को सोचना होगा..क्योंकि जिस समाज में हम रहते हैं..जिस समाज का हम लोग एक अभिन्न अंग हैं...उस समाज के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य भी है..अगली बार आप जब भी घर से निकले....और किसी शख्स को परेशानी में देखें तो एकबारगी ज़रूर सोचिएगा..उसके बारे में..मदद का हाथ बढ़ाने में कोई हर्ज भी नहीं है.. क्या पता हमारी छोटी सी पहल उसके लिए बहुत बड़ी मदद साबित हो.

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